ऊँचा लक्ष्य
यह जगत कुछ इस रुप में हमारे सामने आता है कि जिसमें कोई चीज़ संयोग से नही हुई। बल्कि जगत का प्रत्येक अंश एक लक्ष्य की ओर दौड रहा है। और वह लक्ष्य अपने से बडे लक्ष्य की ओर दौड रहा है। इसी प्रकार अंतिम लक्ष्य प्राप्त होता है।

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